दुःख
प्रस्तावना: प्रतिबिंब के कई पर्यायवाची शब्द है। जो अलग-अलग स्वरूप में परछाई के रूप में देखी जाती है। प्रतिबिंब एक छवि है। एक दर्पण है। हम हमारे ही छवि को परछाई और दर्पण में देख सकते हैं। परंतु परछाई में हमारी छवि सिर्फ एक परछाई होती है। असली चेहरा दिखाई नहीं देता है और दर्पण में हमारा प्रतिबिंब असली दिखाई देता है।हम जैसे हैं वैसे ही हमारी छवि को देख पाते हैं।
यहां लेखक का इस लेख में कहने का तात्पर्य यह है कि हम हमारे ही अच्छे बुरे कर्म की छवि को हीं देख…. हमें सुख और दुःख का अनुभव करना हैं। इसमें सजा देने में ईश्वर का कोई रोल नहीं होता है। ईश्वर तो सिर्फ हमारे हर रोल में एक न्यायधीश है।
ईश्वर के दरबार में हमारे पाप पुण्य का बटन ऑटोमेटिक दबता रहता है और परिणाम भी ऑटोमेटिक घोषित होकर हमें समय पर रिजल्ट मिल जाता है। इस रिजल्ट में कहीं हमें खुशियां मिलती हैं, तो कहीं हमें दुःख मिलता है।
मेरा अनुभव कहता है कि, जिस प्रकार आत्मा शरीर से न्यारा और प्यारा होते हुए भी जब गर्भ में शरीर धारण करने के साथ जन्म और मृत्यु के बीच सुख और दुःख का अनुभव कर, जब शरीर जर्जरित हो जाता है तो आत्मा शरीर को छोड़कर उसके मूल वतन परमधाम में चले जाता है और यह चक्र सृष्टि के चक्र के मुताबिक चलते रहता है। जिसका कोई अंत नहीं है। इस प्रकार आत्मा का शरीर धारण कर आने जाने का सिलसिला सदा चलता रहता है।
द्वापरयुग और कलयुग ही एक ऐसा युग है की इस युग में शरीर प्राप्त करने वाली आत्माओं को सुख दुःख का अनुभव कर्म के अनुसार होने लगता है। जहां ड्रामा के अनुसार आध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण न चाहते हुए भी अच्छे बुरे कर्म जीवात्मा से बनते रहते हैं, क्योंकि हर एक जीवात्मा पांच विकारों के वशीभूत होता है। जैसे मोह माया काम क्रोध अहंकार……और इस विकार से जीवात्मा इसमें से निकल नहीं पता है।
परंतु पुरुषोत्तम संगम युग (लीप ईयर) ही एक ऐसा युग है जहां परमपिता परमात्मा शिव को उनके कथन के मुताबिक 5000 साल बाद पुरानी दुनिया का विनाश कर नई दुनिया (सतयुग का) की स्थापना करने आना ही पड़ता है क्योंकि जीवात्माएं पापों से त्राहिमाम होकर पुकारती है… बचाओ बचाओ बचाओ….हमें पापों से मुक्त करो..
सिर्फ सतयुग और त्रेता युग ही एक ऐसा युग है। जहां आत्मा शांति का अनुभव करती है। यहां ना कोई विकार होता है ना कोई बुरे कर्म होते हैं। इस समय आवागमन करने वाली आत्माएं संपूर्ण ब्राह्मण आत्माएं कहलाती है। सभी आत्माएं संपूर्ण पवित्र होती है। अपवित्रता इस समय शेष नाम से भी नहीं होता है। इस युग में विचरने वाली सभी ब्राह्मण आत्माएं सर्वगुण संपन्न, 16 कला संपूर्ण, निर्विचार निराकार निरअहंकारी होती हैं।
परंतु आज तक हम सुख और दुःख को सही अर्थ में समझ नहीं पाए हैं। आज हम सुख को सिर्फ दंपति सुख, भौतिक सुख, संपत्ति-जायदाद, यात्राएं, पाठ-पूजा, हवन,भवन ,मौज-मस्ती, शोखीया, परिवार, दोस्ती-यारी और अपने बच्चों में देख रहे हैं और ढूंढ रहे है और इसी को सर्व सुख समृद्धि समझते हैं। ईश सुख के नशे के आगे असली भगवान को हम भूल गए हैं और अकाल तख्त आत्म सुख को भी हम आज भूल गए हैं और देह अभिमान में घूमते रहते हैं और देह के संबंध में मस्त रहते हैं।
आज हमारा ध्यान शरीर स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता राजयोग ज्ञान की तरफ बहुत कम है। सिर्फ है तो, मूर्ति के आगे झुकना, मांगना, रोना और भटकने के सिवाय कुछ भी नहीं है। आज घरों में आध्यात्मिक पुस्तक लाइब्रेरी को स्थान बिल्कुल नहीं दिया गया है और दिया गया हो तो सिर्फ सिर्फ जंबो जेट टीवी को स्थान दिया गया है। आज घरों में मंदिर बनवाकर बड़ी-बड़ी मूर्तियां को स्थान दिया गया है परंतु खुद मूर्ति समान देवी देवता पूजनीय नहीं बन पाए है..!!??
हम आजकल पोथी पढ़कर और पोथी वाचक द्वारा सुनी सुनाएं गए वाक्य को अपने ही अकल (बुद्धि) से अनुमान लगाकर कह देते हैं कि हमारे ही कर्मों की सजा हम ‘भोगत’ रहे हैं और बिस्तर पर पड़े पड़े चीख चीखकर रो रोकर अपना प्रदर्शन कर रहे हैं और लोगों को व्याकुल कर रहे हैं और भगवान को, पीढ़ी को और अपने खुद के ही बाल-बच्चों, पति-पत्नी का दोष निकाल कर उनकी अवहेलना सबके आगे करते फिरते रहते हैं…!!??
इस तरह आज हम खुद ही हमारे जीवन की खुशनुमा भरे वातावरण को दूषित कर बदनाम कर रहे हैं..!!
– यह कहां तक हमारे लिए न्याय पूर्ण साबित होगा….??
जरूर है आज सोच समझ कर चिंतन मनन करने की…… हम हमारी इस अवस्था को स्वीकार कर…….शांति से झेलकर प्रायश्चित करके सामना करें और शांत रहे। यही हमारे लिए बेस्ट उपचार और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने का है।
हर प्रकार के सुख और दुःख का ‘भोगने’ का कारण हम खुद ही है। इसमें हमारे को दुःख पहुंचाने के लिए बीच में किसी का रोल नहीं होता है। यह हमें समझना आवश्यक है। यही सोच हमें हिम्मत देती है। सहनशक्ति देती है और समझानी देती है और परिवार में एकजुट बने रहने की प्रेरणा देती है। जिस परिवार कुटुंब में एकता, भाईचारा है वहां रोग भी जल्दी भाग जाता है और दर्द का पता भी नहीं चलता है। यह सच है।
हमारी आसक्ति……हमारी लोगों के साथ बदले में रखी गई कंडीशन ही हमें दूसरों को लेकर कष्ट पहुंचाती है।हमारा नजरिया, हमारी सोच, हमारी लालच, हमारा जंगली खानपान, जंगली शैतानी भोग विलास, पर स्त्री पुरुष गमन, आदमखोरी, रेप, बलात्कार, लूट फाट डकैती, ब्लू फिल्म, खराब संग दोष, विश्वास घात, अंध श्रद्धा, साइड सीन देखते एक्सीडेंट, प्रकृति के साथ घीनोनी हरकतें, भ्रष्टाचार, देशद्रोही कार्य मनुष्य मानव जन्म जाति के साथ शैतानियत भरें दुर्व्यवहार की हदें पार करना ही……. यह सब हमें दुःख पहुंचाने वाले हमारे ही कर्म है और हमारे द्वारा ही इस प्रकार का खरीदा गया दुःख है। किसी ने हमें दिया नहीं है।
दूसरा दुःख का कारण है हमारी जीवन जीने की शैली, जैसे हमारा खानपान, दृष्टि वीकार, नकारात्मक सोच व्यवहार कर्म भी मायने रखती है। हमारे द्वारा बन्द कोठरी में चोरीछुपी से किए गए बुरे कर्म से भी हम बच नहीं सकते हैं। आपकी आत्मा ही आपको सोने नहीं देगी।
किसी भी दुःख को ‘भोगना’ शब्द को हम अधिकतर उपयोग करते हैं। परंतु यह शब्द लोगों को मन मस्तिष्क से होकर हृदय को दर्द पहुंचाता है और आंख में से अश्रु धारा बहने लगती हैं और पूरा वातावरण गमगीन बन जाता है।
कभी-कभी एक दिन के जन्मे बच्चे को भी हृदय की बीमारी से बहुत कष्ट पड़ता है और जन्म से लेकर युवावस्था तक बिस्तर पर पड़ा रहता है। जैसे थैलेसीमिया, मेंटल डिजीज, ब्रेन ट्यूमर, पैरालिसिस आदि गंभीर बीमारी को लेकर आजकल हम देखते हैं। इसको हम क्या कहेंगे ‘भोगना’ कहेंगे..?
जहां तक मेरा मानना है कि यह अवस्था जन्मदाता और जन्म लेने वाले के बीच एक हिसाब किताब होता है जो जन्मदाता को निभाना(सेवा करना) जरूरी पड़ जाता है और समय आने पर ऐसे अपाहिज बच्चों की मृत्यु होने के बाद ही छुटकारा मिलता है। मतलब हिसाब किताब (लेनदेन)पूरा हो जाता है।
‘ सेवा करके भूल जाने में ही सबसे बड़ा सुख है।’
परिवर्तन संसार का नियम है’। यह श्रीमद् भागवत गीता का उपदेश है। शरीर छोड़कर गई आत्मा को अधिक याद करना भी एक प्रकार का दोनों को कष्ट है। हमारे लिए और उसके लिए भी। इसलिए बीच का मार्ग अपनाना ही योग्य है। उस आत्मा से हम मुक्त बने और उसे भी मुक्ति दे दे और ईश्वर के कार्य में हम विच्छेद रूप ना बने। उस आत्मा की शांति के लिए पिंडदान दक्षिणा आदि कर उस आत्मा को शांति प्रदान करें। यही हमारा श्रेष्ठ संकल्प हो ताकि हमारे घर परिवार में सुख शांति और समृद्धि बनी रहें।
इस तकलीफ के बारे में ना हम जानते हैं ना आप जानते हैं कि ऐसा हमारे साथ क्यों होता है…!? परंतु होता है। हमें जरूर स्वीकारना होगा। मानना होगा। झुकना होगा। कोई भी फ़रियाद करे बिना। क्योंकि हम ईश्वर की संतान है। यह पूरी सृष्टि ईश्वर द्वारा बनाई गई एक रचना है और हम सब टाल टालियां है। कभी हरियाली कभी पतझड़, यह चलता ही रहता है कहीं धूप और छांव की तरह…..
यह सब ईश्वर द्वारा हमें दंडित किया गया ड्रामा का एक प्रकार का सब खेल है। हमारे ही सूक्ष्म प्रारब्ध कर्म है। जो हमें ख्याल में कभी-कभी नहीं आते हैं और जाने अनजाने सूक्ष्म से भी सूक्ष्म गुनाह हम कर बैठते हैं। उसका ही यह अंजाम है और दूसरा कुछ भी नहीं है। इसलिए जैन धर्म के महान उपदेश तीर्थंकर महावीर स्वामी ने कहा है- ‘जीवों और जीने दो’।
हर समस्या, समय पर आएगी अपना चमत्कार बताएगी और समय पर विदाई ले लेगी। यह मानकर हमें हर संघर्ष का सामना कठोर बनकर, निर्भय होकर भयभीत हुए बिना जीवन जीना है। यही जिंदगी जीने का हम सब का अनिवार्य सूत्र होना चाहिए।
‘लोग क्या कहेंगे’… सुनकर अनसुना कर देना ‘लोग तो कहेंगे’…. ‘यह मानकर आगे बढ़ते रहना ही जिंदगी है’।
अच्छा है कि किसी की हम जब खबर निकालने जाए तो उस पीड़ित आत्मा को ‘भोगना’ पड़ता है ‘भोगना’ पड़ेगा शब्द का उपयोग करने से हम रुके (बचे) और कहने वालों को रोका जाए तो बहुत ही अच्छा होगा और उस जगह का वातावरण बिगड़ेगा नहीं और हमारी मुलाकात भावपूर्ण पूर्ण होगी।
बीमारियां सुख-दुख, आपदा विपदा, एक्सीडेंट जो कुछ भी हम देख रहे हैं और सामना कर रहे हैं उसके कारण हम खुद ही हैं। इसका कोई भी जिम्मेदार नहीं है। कोई भी फरियाद करे बिना सिर्फ हमें एक्सेप्ट करना है और किसी भी दुःखी आत्मा को ‘भोगना’ कड़वे शब्द का उपयोग न करना ही उचित और कल्याणकारी भाव है। ‘दुआ की झोली भरकर जाओ और दुआ की झोली भरकर लेकर आओ’ मतलब -‘दुआ दो और दुआ लो’।
तो कृपया आज से हम ‘में भोग रही हूं’। ‘वह भोग रहा है’। इस प्रकार के ‘शब्द’ बोलने और कहने से हम बचें और दूसरों के लिए और अपने लिए भी उपयोग में न लाएं। सिर्फ दर्दी की मुलाकात ‘घरपर या अस्पताल’ में लो तो सिर्फ ‘उसे जल्द से जल्द अच्छे हो जाने का आशीर्वाद दे’। यही हमारी और आपकी मुलाकात उसके लिए एक भावपूर्ण मुलाकात साबित होगी। जिसमें परमात्मा भी राजी रहेंगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करेंगे और दुआए हम सबके काम में आएगी। इसलिए दुआओं का खाता जमा करते चलो…..
‘मैं, -मेरे कर्म भोगत हूं’ – जीवन में ‘भोगता’ ‘भोगती’ शब्द का उपयोग हम न करके दुःख को एक ड्रामा समझ कर सहन कर लेना, प्रायश्चित कर लेना, कबूल कर लेना और ईश्वर को याद करना ही श्रेष्ठ उपचार है।
हर दुःख के पीछे का कारण हम ही जानते हैं और ईश्वर, दूसरा न कोई.. यह सोच समझ के दुःख को स्वीकार करो, सहन करो और किसी को कोषों मत… तो भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करोगे और दर्द में से, सजा मे से जल्द ही छुटकारा पाऐंगे। हर दुःख के जवाबदार हम खुद ही हैं। जो हमें अकेले ही सहन करना पड़ेगा, मृत्यु के अंत तक….
उसमें से तुम्हें कोई भी बचा नहीं सकता है ना दौरा, न धागा, न भगवान, ना पूजा पाठ, मंत्र हवन, ना तुम्हारे द्वारा किया गया आपघात तुम्हें बचा सकेगा। जब जब हम भगवान को भूल जाते हैं तब तब हम समस्याएं खरीद लेते हैं और वही समस्याएं हमारे लिए दुःख का कारण बन ऊभर आती है। इसलिए परमात्मा शिव कहते हैं कि मुझे हर घड़ी सांसों स्वास याद करो तो मैं तुम्हारा आधा दुःख माफ कर दूंगा।
आज इतिहास गवाह है। अगर हम सभी के दुखों को अपने दुःखों के साथ जोड़कर दृष्टांत के रूप में देखा जाए तो राजा दशरथ,राजा हरिश्चंद्र श्री राम एवं सीता, सावित्री, वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई आदि एवं महाराजा शिवाजी, महाराणा प्रताप, तात्या टोपे, राष्ट्रीय क्रांतिकारी वीर… वीर सावरकर, वीर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस आदि तथा आज भी राष्ट्र की रक्षा के लिए राष्ट्र पर अपने प्राणों की आहुति देकर शहीद होने वाले अपने भारत राष्ट्र के वीर अगणित योद्धा फौजी जवानों के दुखों के आगे हमारा दुःख कुछ भी नहीं है। जो आज भी उनका परिवार झेल रहा है। यह सब सृष्टि का बना बनाया चक्र है। इसी तरह इसमें हम सब पिसते रहेंगे।
ईस प्रकार की….. ‘मृत्यु और दुःख’ को हम कौन से प्रकार का ‘भोगना’ कहेंगे.? दुःख दुःख ही है। संकट संकट ही है। आपदा विपदा आपदा विपदा ही है । सिर्फ हमें स्वीकारना होगा……आगे बढ़ना होगा…….. और कोई चारा नहीं है।
यही जिंदगी है। जिंदगी को हंसकर के जियो या मर के जियो या तड़पकर जियो, जीना तो पड़ेगा ही… मौत मांगने से कभी नहीं आती है। मौत का भी कोई निमित्त आखिर बनता है। मृत्यु का स्मरण भी हमें बुरे कर्म करने से रोकता है। जिंदगी के साथ-साथ हम अपनी मृत्यु को भी सफल और अमर बनाएं, लोग याद करके कहें की कोई मां बाप का लाल था कि आज ‘वो इस धरती पर से उठकर चल बसा।’
अस्तु
डॉ कनैयालाल माली ‘उत्सव’ (उदयपुर)
मोबाइल नंबर 9913484546
Email: utsav.writer@gmail.com
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