यात्री खुद ना जाने, कब यात्रा पूणॅ होनी है?
गंतव्य है दूर कितना, लाख मुसीबत आनी हैं ।
कमॅ हो निरंतर सबका, यही कोशिश जारी है,
जिंदगी है क्या दोस्तों? बहुत कठिन कहानी हैं ।
हो पतझ़ड या हो सावन, बस चलती ही जानी है
नहीं रुकती किसी हाल में, यात्रा यह निराली है।
आना जाना लगा रहेगा, कमॅ का फेरा जारी है,
बचना पाएगा कोई इससे न्याय का पलडा़ भारी हैं!
Reshma Patel
સુરત
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