सरल व्यक्तित्व और आध्यात्म….

          सरल व्यक्ति की विशेषता वह होती है कि वो सरल शुद्ध निष्कपट पवित्र आत्मा होती है। आध्यात्मिकता उसके चित्र और चरित्र में कूट-कूट कर भरी होती है।उससे हीं उसके सरल संस्कार द्वारा उसके व्यक्तित्व का विकास होता हैं और हम लोग उससे आकर्षित होकर वाह वाह क्या बात है करतें करतें तालियां बजाकर, खुश होकर झूम उठते हैं। यही आदमी की सरल व्यक्तित्व और आध्यात्मिकता की परिभाषा है । 
            आओ हम आगे विशेष सरल व्यक्तित्व और आध्यात्म के बारे में मीठे खट्टे कड़वे अनुभव के विषय में जानने का प्रयास करेंगे। 
        जैसे उसकी आगाज (आवाज) सबके दिल की गहराई तक जाकर मन कों छुकर प्रफुल्लित कर देती है। क्योंकि हमारा मन ही एक ऐसा संवेदन शील मस्तिष्क में स्थान धराने वाला, चिंतन मनन विचार और मेडिटेशन में सहायक होने वाला भाग है, की वह दिल की गहराई तक जाकर, दिल की अंदरुनी संवेदना को उजागर कर, ईश्वर से मिलन मनाने का एहसास करवाता है, मैं कौन हूं..? की पहचान करवाता है और हमें सरलता से हमारे गुण धारण करवाने में मदद करता है। यह हैं हमारे गुण…. पवित्रता प्रेम शक्ति शांति सुख ज्ञान आनंद।
         मेरे अनुभव से शरीर का कोई भी अंग हमारा दुश्मन नहीं है और न हमारा मन दुश्मन है न भगवान हमारे दुश्मन है ना मां बाप सगे स्नेही मित्र हमारे दुश्मन है। दुश्मन तो  हमारे ही स्वार्थ में हमारी बुरी सोच संकल्प नजर आदतें और संगत होती है और एक होता है हमारे द्वारा ही किए गए हमारे बुरे प्रारब्ध कर्म।
           मन जैसा कोई मित्र नहीं है। जब हमारा मन मित्र बन जाता है तो शरीरधारी मित्रों की आवश्यकत्ता नहीं पड़ती है। एकांत ही उसका मित्र बन जाता है और वह व्यक्ति एकांत प्रिय बन शांति का अनुभव करने लगता है और एकांत उसके सरल जीवन की यात्रा बन जाती है और यहीं उसकी सरल जीवन की सरलता की यात्रा आकर्षण का केंद्र बिंदु बन जाता है।
         जिसे हम प्रयागराज की यात्रा भी कह सकते हैं और लोग आपो आप उसकी सरल यात्रा में सरलता से आकर्षित होकर खींचे चले आते हैं। जिसका दोस्त खुदा उसको किसी की परवाह नहीं….. जिंदगी आनंद उत्सव बन उभरती आतीं है। वाह जिंदगी….. 
          मन अपने आप में खूब शक्तिशाली होता है क्योंकि उसका संबंध (अटैच) मस्तिष्क से होता है जो हमारी हर परिस्थिति में सहायक बनता है। अगर मन की संवेदना को हम सकारात्मक अर्थ में सही तरह से जीवन में उपयोग कर ले तो, मन को पहचानने के लिए हमें आंतरिक मन की गहराई तक जाना पड़ता है और वह जरिया है मन द्वारा आत्म खोज….   
          ‘राजयोग मेडिटेशन द्वारा ही जाना जा सकता है।(सारा खेल मन का ही है) आंखें बंद करके बैठने से नहीं, खुली आंखों से समझा जा सकता है।’ (एकाग्रचित ध्यान)
            जिसका स्थान है मस्तिष्क के आधार पर, नाक के पुल के पीछे जिसे हम हाइपोथैलेमस पिट्यूटरी ग्रंथि कहते हैं। जो एक ज्योति बिंदु समान विराजमान है। यहां ही आत्मा का स्थान है जो हम राजयोग (मेडिटेशन) सीख कर उसकी गहराई तक अंतरध्यान लगाकर मन के चक्षु द्वारा ही देखा जा सकता है और हम उस गहराई तक पहुंच सकते हैं।
          आध्यात्मिक ज्ञान होने से हम आत्मा और परमात्मा को पहचान सकते हैं और आत्मज्ञान होने से हम स्वयं को पहचानने लगते हैं जिसे हम आत्मा कहते हैं और आत्मा को शरीर प्राप्त होते ही आत्मा शरीर का उपयोग करने लगती है। आत्मा को हम तीसरा नेत्र भी कह सकते हैं। 
        मन द्वारा ही हम जानने और पाने की अवस्था को इमर्ज कर (visualize) सारी दुनिया का भ्रमण कर सकते हैं। मन की गहराई एक समुद्र की गहराई से भी विशाल होती है। मन ही समाज में हमें एक दूसरे को जोड़कर रखता है। जिसके पास मन होते हुए भी मन का अनुभव नहीं कर पाता है तो वह आदमी स्ट्रेस (मानसिक व्यथा) में चला जाता है। मन का लाभ हम मेडिटेशन करकें  ले सकते हैं।
          क्योंकि आध्यात्म भी एक विज्ञान है।   विज्ञान लोगों को नहीं जोड पाएगा परंतु आध्यात्मिक विज्ञान ही एक ऐसा विज्ञान है जो सारी दुनिया के लोगों को संगठित करने में एक रूपरेखा बना सकता है। साइंस का युद्ध दुनिया को एक साथ साफ नहीं कर सकता है परंतु आध्यात्मिक विज्ञान (नेचर) 1 मिनट में साफ कर सकता है।(आंधी तूफान अर्थक्वेक से)
        मन का उपयोग हमें किस प्रकार करना है, वह राजयोग (मेडिटेशन) के अभ्यास से हीं हमें सीखने को मिलता है। क्योंकि आत्मा का तीन संस्कार हैं- वह संस्कार है मन बुद्धि और संस्कार।
         ‘जगत में  कहीं भी कोई ऐसी गोडली यूनिवर्सिटी नहीं खुली है कि जो हमें राजयोग मेडिटेशन का सही अर्थ बता सके और सीखा सके।’
(स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रैक्टिकल अनुभव को बताते राजयोग के विषय में खूब लिखा है)
           आत्मा की अनुभूति और ईश्वर से मिलने का सुगम मार्ग सिर्फ  प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय माउंट आबू एवं उसके अंतर्गत वर्ल्ड में 140 जगह पर अलग-अलग राजयोग मेडिटेशन सेंटर पर संपूर्ण पवित्र आत्माओं देवी शक्ति स्वरूपा भाई बहनों द्वारा सिखाया जाता है।
           ऐसा समझे कि स्वयं भगवान शिव ही हमें आकर पढ़ा रहे हैं। भगवान शिव नॉलेज फूल है। क्योंकि यह ज्ञान आजकल कोई शास्त्र में नहीं लिखा गया है, न कोई भी यह शरीर धारी मनुष्य ज्ञान लिख सकता है। भगवान का ज्ञान बहुत ही वंडरफुल होता है। भगवान ही हमारे मात-पिता भाई बहन गुरु टीचर सद्गुरु डॉक्टर वैध हकीम फिजिशियन और सर्जन  है,देवों के देव  हैं। भगवान (बाप) हमारे गुप्त है, उनकी नॉलेज भी गुप्त हैं और उनकी वर्षा भी गुप्त है।
         ‘उनको याद करो और आत्म अभिमानी बनो तो सरल व्यक्तित्व के सारे गुण आप ही प्राप्त कर सकोगे, जीवन जीने का आनंद कुछ और ही होगा यह मेरा अनुभव है।’
            आज इस गोडली यूनिवर्सिटी से साधु संत सन्यासी आत्मज्ञान को सुनकर आकर्षित होकर जुड़ रहे हैं और लोगों को भी जुड़ने का संदेश दे रहे हैं। क्योंकि अब समय की- ‘यहीं पुकार है कि कलयुग का अंत है।’
           मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्रजी, जो अपने आप में गुणों के पालनहार थे, इसलिए आज उनकी प्रतिमा को पूजा जाता है और सारा जहां नत मस्तक कर रहा है। आज अयोध्या (जन्मभूमि) में उनकी लोकप्रिय प्रतिमा एक सबूत के तौर पर स्थापित की गई है। यही उनकी सरलता की सच्चाई का प्रतिबिंब है। इस भावनात्मक ‘गुण’ शब्द रूप इंसान के इंसानियत की प्रतिभा को उजागर करता है। 
          हम सब आप हर आदमी के अंदर उसके छुपे सरल व्यक्तित्व को ढूंढने का प्रयास करते हैं कि वह आदमी मित्र बनाने लायक हो, पवित्र हो,सरल हो, नैनों में विकार न हो,शीतलता हों,  पवित्रता का भाव हो, मिलनसार हो,शांत हो, मृदुल हो, दीर्घ दृष्टा हो, उसे हम अपने घर में बुलाकर उसकी मेहमान नवाजी कर सके…उसमें आध्यात्मिकता का वास हो, वह प्रेम का सागर हो, प्रेरणा की मूरत हो…..
           ऐसे व्यक्ति की मित्रता एक मंदिर के देवी देवता समान आदरणीय होती है। उसे देखकर हमें खुशी मिलती है। हमारा मन प्रफुल्लित होकर गदगद हो उठता है और ऐसा नेक इंसान इस धरती पर सबके लिए कल्याणकारी आदरणीय और सम्माननीय होता हैं। 
           इनका संग भी हम सबके लिए दोष रहित होता है। कहावत भी है कि संग तारे और कुसंग डुबोएं। संग उनका करना चाहिए जो अच्छा बरसते हैं, जो बरसते नहीं उनका संग रखने से फायदा ही क्या..! संग का दोष बहुत लगता है कोई किसके संग से हीरा जैसा बन जाते हैं, कोई फिर किसके संग से ठिक्कर (कंकड़-पत्थर) बन जाते हैं। जो ज्ञान वान सरल होंगे वह आप समान जरूर बनाएंगे। इसलिए संग से अपनी संभाल जरूर रखनी है।
           सरल होना भी उतना सरल नहीं है। अगर व्यक्ति विशेष ठान लेता है तो वह खराब समय को भी एक ड्रामा का चलेंज समझ कर अपने आप को हर परिस्थिति में स्थिर रखकर शांत रखता है और वह निर्मोही रहता है। वह डगमगाता नहीं है।
           सरल व्यक्ति की विशेषता यह है कि वह निष्कपट,अहंकार रहित और देही (आत्मा) अभिमानी होता है।आत्म (दही) अभिमानी होना भी एक स्वाभिमान हैं जो इंसान के इंसानियत के, पद की गरिमा के लिए बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण है।
          भगवान भी इस प्रकार के ऐसे व्यक्ति की उसके व्यक्तित्व के आगे झुकता है और वह व्यक्ति भगवान का संदेश वाहक बनता है। उसकी वाणी उसका संदेश एक चमत्कार से कम नहीं होता है। ऐसी व्यक्ति आत्म साक्षात्कार की अनुभूति भी कर पाते हैं।
         भगवान को भी इस ड्रामा के रंग मंच पर कांटे भरे जंगल को सुंदर बागवान बनाने के लिए किसी न किसी का तन लोन पर लेना हीं पड़ता है और वह तन सरल व्यक्तित्व का ही तन होता है। इस प्रकार समय-समय पर भगवान इस धरती की धरातल पर आकर फिक्स ड्रामा के अनुसार नई आध्यात्म रचना का रचनात्मक उत्थान करते हैं और प्रजा में शांति की लहर बरसने लगती है।
         मैं आपको एक दृष्टांत रूप में कहूं तो जैसे प्रजा द्वारा राज्याभिषेक प्राप्त कर राजा कहलाना, अपने बच्चों का पिता कहलाना, सबसे बड़ा भाई बहन होने का सम्मान प्राप्त करना… मतलब आप अपने परिवार में सभी से बड़े पद के अधिकारी के तौर पर कुदरती रीति से नियुक्त हैं। यही कुदरती नियुक्ति  रीत ही आपके  बड़े होने का एहसास कराती है कि‌ अब आपका दायित्व अपनो के लिए  सरल पन होना जरूरी है। जिसे हम कह सकते हैं कर्तव्य परायणता
आत्मीयता मतलब आत्म  निष्कपट सम्मान के साथ  जीना है।
        इसे हम वात्सल्य प्रेम भी कह सकते हैं, वात्सल्य प्रेम का मतलब ही होता है कि जिस प्रकार एक मात पिता के हृदय में अपने बच्चों के प्रति स्नेह का भाव झलकता है।
         अधिकांश कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि आदमी, अपने अच्छे व्यक्तित्व को लेकर गफलत में आकर देह अभिमान के कारण अपने को संभाल नहीं पाता है और उसमें विराजमान आध्यात्म IQ EQ रुपी छुपे अच्छे ज्ञान गुण होते हुए भी वह माया रावण के बस में आने से उसकी दिशा और दशा बदल जाती है और यही दिशा दशा बदल जाने के कारण उसमें रहे ‘सरल’ व्यक्तित्व के  गुण लोगों को विपरीत
(ओपोजिट) दिखाई देने लगते हैं और उसकी वाणी व्यवहार से नकारात्मक का अनुभव होने लगता है और तब लोग उससे दूर होने लगते हैं…!! 
          हमें सरल स्थित अपनी बनाए रखने के लिए अपने आप को निरंतर एक ईश्वर की याद में और उसके वर्षा को याद रखना है। तो माया कभी भी हम पर वार नहीं कर सकती हैं।जहां हम में अंदर अहंकार आया वहां माया हमें दबोच लेती है।
           सरल व्यक्तित्व की पहचान जानने के लिए पहले हम खुद को पहचाने कि मैं कौन हूं..? मेरा जन्म किस लिए हुआ है और मैं क्यों आया हूं और क्या करके मुझे जाना है। जब तक हम अपने को आत्मा नहीं समझेंगे तब तक हम सरल  बनने के गुण को धारण नहीं कर पाएंगे। 
           श्रीमद् भागवत गीता ही एक ऐसी ग्रंथ  है जो आप इसको पढ़कर इसमें बताए गए मार्ग पर चलकर सरल व्यक्ति बन सकते हो। इसमें संपूर्ण राजयोग की पढ़ाई है। इस ग्रंथ को गोडली यूनिवर्सिटी का ग्रंथ भी कहना अतिशयोक्ति नहीं है। क्योंकि आज हर एक मनुष्य प्राणी को सरल गुण धारण करने के लिए राजयोग ज्ञान की जरूरत है।
          आज व्यक्ति को पता भी नहीं चलता है कि, मैं क्या कर रहा हूं और मुझसे क्या हो रहा है…परंतु उससे मिलने वाले व्यक्ति को, उसके व्यक्तित्व के अहंकार का एहसास होने लगता है। वह ‘बाहर कुछ और अंदर कुछ  हैं।’ फिर समझदार व्यक्ति उसका साथ छोड़ देता है।
          क्योंकि इस  नाटकीय रंग मंच की दुनिया में ड्रामा के अनुसार अच्छे-अच्छे अधिकांश लोगों पर अलग अलग विकारी, काम कटारी रंगों का रंग और अहंकार का नशा चढ़ जाने के कारण खुद को ही मनुष्य भूल जाता हैं की – मैं कौन हूं…?
            इसलिए कहा जाता है की- ‘सरल कहलाना सरल है परंतु सरलता को धारण करना मोसी का घर नहीं है। जैसे सन 2025 के कुंभ के मेले में हमने अनुभव किया है कि कई भगवाधारी वस्त्र के भगवा वस्त्र उतरवा लिए गए और पद पर से हटा दिया गया है और किन्नर अखाड़ा बना अराजकता का अखाड़ा…!!??
          कारण हर एक पद की विशेष गरिमा होती है और यही गरिमा, व्यक्ति का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण समाज में स्थिर रहकर समाज का उत्थान करने का कर्तव्य बन जाता है, मगर अनावश्यक दलाली (एजेंट) द्वारा उस व्यक्ति को स्थान प्राप्त नहीं होता है और न चला लिया जा सकता है क्योंकि हिंदुत्व भारतीय सनातन धर्म का नियम है की आड़ में, धर्म को लांछन लगे, ना धर्म किसी भी आडंबरों का शिकार होकर कलंकित बनें।
         इस भावनात्मक आध्यात्म गुण को, ‘सरल’ संस्कार स्वभाव को बनाए रखने के लिए व्यक्ति में पवित्रता, सत्यनिष्ठा, दृढ़ संकल्प शक्ति की जागरूकता होनी जरूरी है, जागरूकता यहां तक कि उसके कदमों कदमों पर खयालों में सरल पन होना आवश्यक है। नहीं तो वह व्यक्ति लोगों के दिलो-दिमाग में से हट सकता है। ईश्वर भी साथ छोड़ देता है। वह व्यक्ति कलंकित बन सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
         आज हर आदमी…. हर इंसान में उसके सौम्य को ढूंढ रहा है कि वह कितना सौम्य है, मतलब कितना रमणीक है। हल्का है। दयालु है। वफादार है। सुंदर है। शीतल है। नरम है। मुलायम है। चंद्रमा समान हैं । तब जाकर उसे ही शांति का प्रतीक माना जाता है। जीवन साथी भी आज हम गुणवान ढूंढ रहे हैं। मगर क्या हम ऐसा बनने का प्रयत्न कर रहे हैं..??
         शब्द ही शब्दार्थ जीवन की आगाज शैली बन जाती है और होना भी अनिवार्य है। शब्द ही ज्ञान है और ज्ञान ही पन्नों पर अंकित किया जाता है तब जाकर वह एक श्रीमद् भागवत गीता समान आदमी के लिए आदमी की एक आगाज शैली बन उभर आती है। उसकी पहचान बन जाती है।
          परंतु कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि अपरोक्ष और परोक्ष में वाणी बर्तन स्वभाव भिन्न-भिन्न अनुभव किया जाता है और यही अवस्था उस आदमी के लिए उसकी एक छाप छोड़ जाता है। ‘अंदर कुछ है और बाहर कुछ है।’ एसी पहचान बन जाने के कारण  उसका स्तर  नीचे गिरने लगता है। 
       ‘कहने का कुछ और करने का कुछ’

          इसलिए कहा जाता है कि ‘मन में कुछ और व्यवहार में कुछ।’ इस सरल चित् अवस्था को बनाए रखने के लिए हमें हर पल जागृत रहना जरूरी हैं। हमे स्वमान की स्टेज पर बैठना है। यहीं स्वमान हमारा एक मिसाल बन जाएगा कि मैं कौन हूं..? और यहीं… मैं कौन हूं..? की पहचान हमारा ‘सरल’ स्वभाव  उभर कर व्यक्ति विशेष बन जायेगा।
            हम सब एक सामाजिक प्राणी है और समाज के उत्थान के लिए ही हमें जन्म मिलता है। हमारा सरल व्यक्तित्व ही समाज का उत्थान करने में सक्षम बन सहायक हो सकता है। बाकी सब कुछ एक  ‘करन करावनहार तो एक शीव परमात्मा ही है जो हमें मदद करते हैं और करते रहेंगे परंतु उनकी शर्त यह है कि हमें उन्हें निरंतर याद कर ‘सरल’ बनना होगा और यही परमपिता परमेश्वर की निरंतर याद हमें सरल बनाए रख सकती है। जिससे हम सबके लिए योगी उपयोगी और योग्य बन सकते हैं।
            हम सब इस धरती पर सरल बनने के लिए ही जन्म लिया है। हम दृढ़ संकल्प करें कि  सरल रहकर सदा खुश रहेंगे और लोगों को खुशियां बांटते रहेंगे। हमारा सरल व्यक्तित्व ही सारे सुख की चाबी हैं। मंदिर की, मूर्ति की विशेष दर्शन से अधिक हमें मूर्ति समान बनकर साबित करना है। भगत नहीं हमें ज्ञानी बनना है। अगर हम धार्मिक नाम करण नाम धारण करते  हैं तो वैसा ही गुणवान बनकर दीखाना है। 
           अगर हमारा नाम राम लक्ष्मण सीता हनुमान कृष्ण कन्हैया राधिका शिवनाथ अनसूया लक्ष्मी नारायण अलग-अलग धार्मिक देवी देवता पर नाम रखा है तो वैसा ही हममें पारदर्शीता गुण होना भी आवश्यक है। एक हनुमान थे जो श्री राम के भक्त थे और सीता की रक्षा की थी, रावण की कर्म हीनता  के कारण लंका को जला दिया था  और वही हनुमान नामकरण वाले व्यक्ति समाज में अगर किसी बहन बेटी की मस्करी कर दोषित साबित होते हैं तो हम क्या समझेंगे, इस हनुमान को…!!?? 
          आजकल कई धार्मिक नाम करण  वालो में नाम के गुण का आध्यात्मिकता शेष भी हमें दिखाई नहीं देती है.!? इसलिए अपनें  बच्चों का धार्मिक नाम करण रखने से पहले हमें विचार कर लेने आवश्यक है कि क्या जैसा उसका नाम है रखा है वैसा हम उसे बना सकेंगे.!? क्योंकि प्रकृति में हम जितने भी नाम तत्व को पढ़ते हैं, तो उनमें वह गुण देखे जाते हैं वह सुगंध होती है।
          क्योंकि आज कल सीतादेवी, लक्ष्मण, राम, श्रवण, हनुमान, लक्ष्मीनारायण, दशरथ‌  आदि आदि जैसे कई अन्य धार्मिक नाम धारण करने वाले बच्चों के मात पिता वृद्ध आश्रम में अंतिम सांस ले रहे हैं यहीं आज समाज की सच्ची दास्तान है, इसे नकारा नहीं जा सकता है।
 भगवान शीव ( निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप ) उवाच…. 
यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवती भारत । 
अभ्युत्थानम धर्मस्य  तवात्मान र्सृर्गाम्यहम ।।4.7।।
परित्रणायन साधुना  विनाशाय च दुष्कृताम ।
धर्म संस्थापना र्थाय संभवामि युगे युगे ।।4.8।।
          अर्थात: जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है तब तब में अवतार लेता हूं। 4, श्लोक नंबर 7-8 में है । भगवान कहते हैं कि वे धर्म की स्थापना के लिए पापियों का विनाश करने के लिए और सज्जन लोगों की रक्षा के लिए युग युग में अवतार लेता हूं।
         कलयुग का असर:-आज हम इलाहाबाद प्रयागराज कुंभ मेला 2024 का देख रहे हैं कि धर्म के नाम पर अधर्म इतना बढ़ गया है कि जहां देखो वहां आडंबर ही आडंबर दिखाई दे रहा है और नग्नता ने अपनी सीमा पार कर ली है। बेढंग का वस्त्र परिधानवस्त्र  से लेकर आचार विचार रूप रंग अंग प्रदर्शन ने भी अपनी सीमा पार कर ली है, आध्यात्म के नाम पर लोगों ने आज अंधश्रद्धा मैं आकर मोह माया काम क्रोध अहंकार मैं आकर गंगा में अज्ञानता की डुबकी लगाकर अपने को पावन होने का महसूस कर रहे हैं..!? हजारों करोड़ भगत जन समुदाय एवं साधु संत सन्यासी समुदाय गंगा में शाही स्नान कर रहे हैं..!? क्या साधु संतों का क्रोध शांत हुआ..!?  क्या किसी विकारी मनुष्य को मानव बनाया..!? अर्थ क्या निकल रहा है..!? क्या हम अपने को बदल पाए हैं..!?

       ‘आज दिगंबर जैन मुनी इस धरती पर दिगंबर (नग्न अवस्था) होते हुए भी आज शाही स्नान की तरह किसी भी जगह पर शाही स्नान करते क्यों नहीं देखे जाते हैं..!!??
इनके धर्म के लिए कौन सी फिलासफी अलग होगी…. जहां कोई भी आडंबर नहीं ना कोई भीड़ भाड़…!!??
           इस कुंभ मेले ने मेले में एक गरीब कन्या रुद्राक्ष की माला बेचने वाली नाम मोनालिसा की आंखों ने मोहित कर लिया.. लोग पागल होकर उसके पीछे दौड़ने लगे और वह कन्या अपना बचाव करने के लिए आगे आगे भागने लगी…!!??
            इस माया के कारण वहां हमने आध्यात्मिकता का पतन देखा, और शाही स्नान की भाग दौड़ में कितने कुचलें गए कितने मारे गए,आज इस आध्यात्मिक मेला में कहीं आध्यात्मिकता और कहीं विशेष  नग्नता ही नग्नता दिखाई दे रही थी…. !!??  क्या कितने पावन और पवित्र बनकर, घर आकर, शांत शीतल सरल देवी देवता समान बन पाए..!!??
              धर्म के नाम पर अधर्म आज हम जो देख रहे हैं और हो रहा है इसी को कहते हैं कलयुग और यही कलयुग धर्म को अधर्म बनाता है और मनुष्य की मती मारी जाती है। तब भगवान कहते हैं की धर्म की रक्षा करने के लिए पापियों का नास और सज्जनों का उद्धार करने मैं युग युग आता रहता हूं।
           भगवान कहते हैं सतयुग में आध्यात्मिक के नाम पर ऐसा किसी भी प्रकार का आडंबर नहीं होता है और कोई शास्त्र भी पढ़ाया नहीं जाता है। सब देवी देवता समान पवित्र और योगी आत्माएं सतयुग में निवास करती है और जनसंख्या भी कम होती है। वहां व्यभिचारित्रता नाम से भी नहीं होती है।
             विशेष:-(1) इस आध्यात्मिक कुंभ मेले में भव्य पंडाल व्यवस्था रोशनी आम आदमी के टैक्स के पैसे से ही की जाती है। कोई अलग से खर्च करने के लिए नई अर्थ व्यवस्था नोट पैसे छापने की नहीं की जाती है। यह हमें ख्याल में होना चाहिए। आम जनता को अपनी हुकूमत बताने के लिए राजकीय ड्रामा एक अलग ही होता है जो सामान्य आदमी नहीं समझ सकता है। इस राजकीय ड्रामा के खेल को सिर्फ बुद्धिजीवी प्राणी और भगवान ही जान सकते हैं। सामान्य आदमी को तो ऐसा ही लगेगा कि सरकार कितना खर्च कर रही है। और आम जनता वाह-वाह करके सरकार को नत मस्तक कर प्रणाम करेगी, वोट देगी। अंधश्रद्धा और अज्ञानता के कारण आज धर्म का विनाश हो रहा है। काम और पैसे के उपार्जन में आदमी आज इतना डूबा है कि कर्तव्य परायणता की सरलता को भूल गया है।
              (2) पृथ्वी पर सृष्टि परिवर्तन का एक गुह्य राज़ है। राधे कृष्ण हीं लक्ष्मी नारायण कहलाते हैं।श्रीमद् भागवत गीता अनुसार भगवान पृथ्वी पर आ चुके हैं। वह खुद आकर ड्रामा अनुसार पतीत मनुष्य को पावन बनाकर 5000 वर्ष बाद सतयुग की स्थापना करते हैं, जो समय अब आ चुका है। सृष्टि चक्र ड्रामा अनुसार श्री कृष्ण हीं सतयुग का प्रिंस कहलायेंगे
           जो वर्तमान समय में हम विश्व की घटनाओ  को देखकर समझ कर कबूल कर सकते हैं कि सतयुग आने वाला है और कलयुग जाने वाला है। कलयुग को जाते योगी सरल व्यक्ति  सरलता से देखेंगे और भोगी भोगते देखेंगे।
           इसलिए कहा गया है कि यह संसार परिवर्तनशील है। सृष्टि चक्र के मुताबिक  युग बदलता रहता है जैसे सतयुग त्रेतायुग द्वापरयुग कलयुग और कलयुग के अंत में एक पुरुषोत्तम संगम युग (लीप ईयर) होता है।

समय की पुकार है ईश्वर को याद करो….. वही सब का तारण हार हैं…..

         कितना मीठा कितना भोला
  शिव बाबा भगवान है शिव बाबा भगवान है
            जैसा बोवोगे वैसा पाओगे
         सरल बनो योगी बनो ज्ञानी बनो 
         बदला न लो बदल के दिखाओ
               संग तारे कुसंग डुबोए
             करते चलो सबका भला
                दुआएं लो दुआएं दो
            हम बदलेंगे तो जग बदलेगा

डॉ. कनैयालाल माली ‘उत्सव’ (उदयपुर)
            Spiritual writer 
Mobile number : 9913484546
Email : utsav.writer@gmail.com

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