विषय:- लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे..!?

आज का इंसान इमोशनल होकर चिंता से जीते जी इतना चिंतिंत हो गया है कि लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे.!? अपने को ही अपने से प्रश्न पूछ पूछ कर खुद ही परेशानी महसूस कर रहा है। उसे अपना ही कार्य करने में,आगे बढ़ने में शर्मिंदगी और बदनामी बेवजह की महसूस करता रहता है..!? इसे मेडिकल भाषा में मानसिक फोबिया डिजीज कहां जाता है। इस मानसिक भावनात्मक फोबिया डिजीज में आदमी खुद से डरता रहता है। इसमें उसे घबराहट होती है। भागने की कोशिश करता है। कभी-कभी इमोशनल भाव में आकर निर्दोष आपघात भी कर लेता है। इस प्रकार के कई नकारात्मक विचार धारा से चिंतिंत व्यक्ति के साथ कोई भी नजदीक का इंसान उसका लाभ उठाकर उसके साथ इमोशनल अटैक कर ब्लैकमेलिंग भी कर लेता है। मैंने अपनी आध्यात्मिक जिंदगी में अपनी मेडिकल प्रैक्टिस दौरान मेरे संपर्क में आए अधिकांश दर्दी की मानसिक व्यथा को जाना समझा और पहचाना की वह मानसिक बीमारी से पीड़ित होकर अधिक से अधिक सफर हो रहा हैं। बेवजह से स्ट्रेस में आकर नींद की गोली के साथ कई प्रकार की गोलियां खा रहा है और उसकी साइड इफेक्ट से याददाश्त भी धीमे-धीमे कम होती जा रही हैं, गुस्सा बढ़ते जा रहा है। शरीर कमजोर हो रहा है। थकावट महसूस कर रहा है। उसके रिश्ते नाते टूट रहे हैं। अपने को वह अकेला महसूस कर रहा है। जब मैंने बीमारी को पहचान कर जड़ जानी तो पता चला कि मुख्य इंसान की कमजोरी उसके भय का ही एक नेगेटिव वायरस है।उसके मन मस्तिष्क में 'इमोशनल' का अधिक भाव उत्पन्न होना और इमोशनल होने के कारण ही नकारात्मक भावनाएं जागती है। तो इच्छा हुई कि चलो इस 'इमोशनल वायरस,अनुभव के बारे में प्यारे मित्रों को अवगत कर 'इमोशनल वायरस' रोग क्या है और कैसे इंसान को बाहर निकाला जा सकता हैं। इसलिए एक पथ दर्शक बनने का मैंने प्रयत्न किया है की आप इमोशनल हो या ना हो परंतु इमोशनल होना भी हमारे स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है, यह जरूर पढ़कर जाने और आगे भी अपने मित्रों को पढ़ने के लिए अवगत कर एक जन कल्याण सेवा करेंगे। क्योंकि मानसिक नकारात्मक सोच की बीमारी एक ऐसी बीमारी है की शरीर के कोई भी ऑर्गन्स को अपने बस में करके उसे रोगग्रस्त बना देता है। उसका शरीर कमजोर पड़ जाता है।हड्डी शोल्डर गरदन गैस बदहजमी लिवर आमाशय पित्ताशय भूख का ना लगना रक्त के कणों की कमी चिडचिडापन अनिद्रा गुस्सा बेचैनी मधुमेह चमडी के रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों का वह शिकार हो जाता है और कभी-कभी बीडी तंबाकू एवं ड्रग का सेवन करने लगता है।अपने को अकेला महसूस कर रोता रहता है। इस गंभीर बीमारियों के कारण उसका जीवन जीने का रस खत्म हो जाता है और वह अपने को अकेला महसूस करने से उसमें उदासीनता आ जाती है। उसे अपने और पराये कोई भी व्यक्ति अच्छे नहीं लगते है। यही उसका इमोशनल होना और इमोशनल के कारण नकारात्मक सोच की हालात उसे लकवा ग्रस्त बना देती है। ऐसे लोग पाप और पुण्य को भी समझ नहीं पाते हैं। ऐसे लोग भक्ति और ज्ञान को भी नहीं समझ पाते हैं। यहीं लोग अंधकार में घीरे चलें जाते हैं और उनके जीवन के अंधकार का फायदा चतुर चोर इंसान आकर अपना लाभ उठा लेता हैं। हमें इमोशनल से बचने के लिए अपनी भावना को समझना होगा और किसी के भाव को खुद पर हावी न होने दे। अपने को एक आत्मा समझ देह के विकारों से निकल पवित्र कमल पुष्प समान बनकर एक ईश्वर 'शिव' की याद ही हमें इमोशनल होने से बचा सकती है। दूसरा ना कोई, यह हमें सदा याद रखना होगा। सत्यम शिवम् सुंदरम

हमें इमोशनल नहीं हमें इंपॉर्टेंट बनना है।
हमें हमारे जीवन के महत्व को समझना है।
हमारा यह मनुष्य जीवन बहुत ही अमूल्य है।
लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे उसे नजरअंदाज कर दो, नजर अंदाज करना ही आपके लिए हित कारक है।
लोगों से अटैच नहीं डिटेच रहो, डिटेच रहना ही मतलब अपने आप को इमोशनल से बचाना, मतलब अपने आप को सेफ रखना। एक राजा की तरह जीवन जीना है। यही जिंदगी ‘जिंदगी जीने की इंपॉर्टेंट कला है।’
नेकी करके भूल जाओ। यह भूल जाना ही फल है। ब्याज है। हम अपने को इमोशनल बताकर गरीब कहलाना भी ठीक नहीं है क्योंकि गरीब को हर इंसान परेशान करते हैं। लुटते है।
हमें यह समझना होगा कि हम खुद ही हमारे भाग्य के विधाता है। तकदीर में न
मानकर हमें हमारा भाग्य लिखना और बनाना होगा। ऐसा नहीं की भगवान जो चाहेगा वह मंजूर है.. हमें कुछ नया करके दिखाना है। सब कुछ भगवान पर छोड़ देना हमारी कमजोरी मूर्खता आलस और अज्ञानता है।
जिंदगी एक राजा की तरह निर्भय बनकर हौसला बुलंद रखना है और आगे बढ़ते चलना है। पीछे मुड़कर देखना नहीं है। बस आगे कदम बढ़ाना ही मिशन हो। स्वामी विवेकानंद की तरह। ताकि हमपर कोई इमोशनल अटैक कर ना सके। दया अपने पर करो, प्रेम अपने से करो, पूज्य और पूजनीय खुद बनो। तो फिर देखो आगे आगे होता है क्या.. रिजल्ट सामने दिखाई देगी।
प्रश्न:-लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे..!?
जवाब:- कोई तुम्हें बुरा कहे तो कहने दो।
इमोशनल में रहने वाला इंसान हमेशा डरता रहता है। पाप और पुण्य की व्याख्या करने में वह कमजोर पड़ता है। उसे समझ में नहीं आता है कि मुझसे पाप हो रहा है की पुण्य हो रहा है। वह लोगों के लिए आपे ही, खुद ही भावना में डूबता जाता है। यह इसकी निशानियां है।
प्रश्न:-पाप क्या है..?
जवाब:-हमारे कर्म से किसी भी जीवात्मा, प्रकृति को कष्ट पहुंचे उसे पाप कहते हैं।
प्रश्न:-पुण्य क्या है…?
जवाब:- जो आप चाहते हो कि मेरे साथ सब कुछ अच्छा हो, मुझे तकलीफ न पड़े… वही आप दूसरों के लिए सोचो और करों यही पुण्य है।
इस धरती पर आपकी भावना की कदर करने वाला सिर्फ एक भगवान ‘शीव’ है, दूसरा ना कोई। तो आप भय से निकल कर एक भाग्यशाली बनकर श्रेष्ठ भाग्यशाली बनों। डर से बच जाओगे और आप अपनी इमोशनल अवस्था से बाहर आकर आप एक ब्रिलिएंट और इंटेलिजेंट व्यक्ति बन जाओगे और कोई काम करने में इंसान से भी डर नहीं लगेगा, न भगवान से डरोगे, क्योंकि भगवान के बन जाओगे और भगवान आपका साथी बन जाएंगा क्योंकि वही श्रेष्ठ से श्रेष्ठ सद्गुरु है। बाकी सब शरीर धारी गुरुओं ने पतित मां-बाप से जन्म लिया है। इसलिए उनकी सेवा लेना देना सामान्य मनुष्य देह‌धारी जैसी होती है।
ऐसा सद्गुरु प्राप्त होते ही आप चिंता मुक्त टेंशन मुक्त बीमारी से मुक्त फिर वाह जिंदगी बन जाएगी। आप अपने मन के खुद राजा बन जाओगे। खुद एक खुदा के नेक बंदे बनकर गर्व महसूस होने लगेगा की मुझे भगवान मिल गया। यही मस्त महसूसता आपको आनंद और खुशियों से भर देगा, सुख शांति आनंद का एहसास होने लगेगा। आपका माइंड क्रिएटिव बनकर उभर आएगा और आप एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन उभरेंगे।
इमोशनल सोच रखने वाला इंसान सदा दुःखी रहता है, दुखी यहां तक रहता है कि चतुर लोग उसका इस्तेमाल अधिक से अधिक करते हैं। इस्तेमाल करने वालों में बच्चे भाई बहन परिवार के कुटुंब के स्नेही मित्र सगे संबंधी व्यापारी और अपने को आध्यात्मिक कहलाने वाले तक ‘इमोशनल’ होने वाले इंसान को छोड़ते नहीं है उसे पूरा लालच देखकर नोच लेते हैं।
अपने को इमोशनल बताने वाला इंसान तन मन धन से सेवा देकर भी हर जगह मूर्ख बनता है। इसका दृष्टांत अगर हमें देखना है तो वृद्धाआश्रम में जाकर उनको मिलने से प्रश्नावली करने से आपको पता चल जाएगा कि इमोशनल इंसान के साथ कितना ब्लैकमेलिंग किया जाता है और करने वाले लोग उन्हीं के अपने लोग होते हैं, दूसरा कोई नहीं होता है और ऐसी बेईमानों की संख्या धरती पर अगणित है। जिसे नकारा नहीं जा सकता है।
कमजोर जानवर को भी उन्हीं के समुदाय के जानवर खा जाते हैं। इसी तरह कमजोर यानी इमोशनल बनकर जीने वाले इंसान को इंसान हीं खा‌ जाता है। यह हम कह नहीं सकते कब खा जाएगा। क्योंकि पांच विकारों से जन्मा आदमी पांच विकारों में ही रचा रहता है मोह माया काम क्रोध अहंकार…. यहीं भूत अपने माया जाल में सबको फंसा कर कुंभकरण की नींद लेता है और खुश रहता है और अपने आप को समझता है कि मेरे जैसा माइंड गेम खेलने वाला इस दुनिया में कोई नहीं है।
इसलिए हर एक इंसान का कर्तव्य है कि वह इमोशनल न बनकर मन की सूक्ष्म शक्ति अन्तर्मन को ‌पहचानने का मार्ग अपनाऐ। भक्ति मार्ग में अंधकार है और ज्ञान मार्ग में प्रकाश है। तो हमें सदा प्रकाशित बनकर ही रहना है नहीं तो हमपर इमोशनल अटैक होते ही रहेंगे। लोग हमारे इमोशनल का फायदा उठाते ही रहेंगे और हम गिरते ही जाएंगे फिर उठ नहीं पाएंगे।
इसलिए मन की शक्ति और अंतर्मन को जानना जरूरी है। मन ही आत्मा है। मन ही त्रिलोचन है। मन ही अविनाशी है। तो इस मन द्वारा अविनाशी परमपिता परमात्मा (शिव) की याद मेडिटेशन द्वारा किया जा सकता है। यही है अविनाशी शक्ति ‘शिव’ की… जो निराकार है।
इनका स्मरण हमें…. हर परिस्थिति में इमोशनल बनने से बचाता है और हमपर होने वाले इमोशनल अटैक का सामना हम अपनी बुद्धि से कर पाते हैं क्योंकि आत्मा की ‘मन-बुद्धि-संस्कार’ की एक सूक्ष्म शक्ति है। मन सोचता है, बुद्धि निर्णय लेती है( योग्य बात की ही निर्णय लेती है) तब वह संस्कार में आता है और वही संस्कार हमें इमोशनल होने से बचाता हैं। क्योंकि हमारा सद्गुरु ईश्वर कहलाता है।
आज इमोशनल व्यक्ति हर क्षेत्र में लूटा जा रहा है। उसको लूटने के लिए चारों ओर लुटोरों की फोज खड़ी है। उनके लिए इमोशनल व्यक्ति शिकार कहलाता है। वह किसी भी खून के रिश्ते वालों को अपने स्वार्थ में कभी छोड़ता नहीं है, और वह अरबो खरबो की लोन लेकर भी पलायन हो जाता है। बस उसका स्वार्थ ही उसका मिशन होता है। उसके लिए आध्यात्मिकता कुछ भी नहीं होती है। वह मंदिरों की मूर्तियों को भी चुराकर के बेंच देता है, लूट कर ले जाता है।
वह मूर्ति को भी पूजता है…!!?? आडंबर उसके खून खून में भरा होता है। वह हर प्रकार के खेल करने में अव्वल होता है। वह स्मार्टफोन की तरह चतुराई में नॉलेज फूल होता है।
ऐसे व्यक्ति को पहचानने के लिए पहले हमें अपने मन(आत्मा) को पहचानना होंगा। तब जाकर बुद्धि निर्णय लेंगी ,तब जाकर हम उससे बच सकेंगे, नहीं तो हमारे इमोशनल का फायदा उठाता हीं जाएगा, अटैक करेगा, इसलिए एसे व्यक्ति से बचने के लिए हमें सतर्क रहना जरूरी है और वह सतर्कता हमें एकांत में बैठकर ध्यान धरने से ही मिल सकती है। वह देने वाला है हमें सिर्फ परमपिता परमात्मा ‘शिव’ दूसरा न कोई। शरीर धारी व्यक्ति, पतित व्यक्ति आपको व्यक्तित्व विकास का ज्ञान कभी भी नहीं दे सकता है। परमात्मा की मित्रता ही हमें हर पल रेड ट्राफिक सिग्नल की तरह हमारे साथ रहकर हमें सेफ रखता है।
समाज में सिर्फ एक पवित्र प्रेरणा स्रोत मां बाप है कि वह कभी भी अपने बच्चों के साथ इमोशनल अटैक नहीं करते हैं। मैं यह भी कह सकता हूं कि समाज में आजकल हम देख रहे हैं कि इमोशनल अटैक करने में स्त्री जाति ने भी हद पार कर दी है। वह अपने स्वार्थ में अपने पति के साथ प्रेमी के साथ उसके इमोशनल का फायदा उठाने में छोड़ती नहीं है। क्योंकि आज इंसान ने अपने स्वार्थ में इंसानियत पार करके इंसानियत पर कलंक लगा दिया है।
जब तक हम सावधान नहीं बनेंगे, अपनी शक्तियों को उजागर नहीं करेंगे, अपने को नहीं पहचानेंगे… कि मैं कौन हूं तब तक इमोशनल जीवन आपको जीने नहीं देगा। आप अपने ही इमोशनल के शिकार दूसरों के आगे होते रहोगे।
यह इमोशनल की बीमारी आदमी को कमजोर बना देती है। कमजोर इतना बना देती है कि वह इमोशनल आदमी कुछ करना चाहे तो भी उसके मन में चिंतन चलेगा की लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे… इस डर से वह अपने आप को आगे बढ़ने से रोक लेता है, कि लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे..!? लोग मुझे क्या-क्या कहेंगे यह बीमारी अधिकांश उन्हीं लोगों मैं देखी जाती है, जो अधिक से अधिक इमोशनल होते हैं।क्योंकि इमोशनल ( भावना में ढह जाना) भी एक बीमारी है।
यह बीमारी एक ऐसी गंभीर बीमारी है कि आदमी आपघात करने के लिए मजबूर हो जाता है। इमोशनल इंसान वही होता है जिसमें दया करुणा का भाव और आध्यात्मिकता से वह जुड़ा होता है और वही लोग इमोशनल के शिकार बनते हैं।
परंतु समय कहता है कि इमोशनल ना बनकर इंपॉर्टेंट और परफेक्ट बनो।अपना महत्व समझो। यही विचारधारा आपको आगे ले जाएगी।
आज कल डॉक्टर लोग भी मानने लग गए हैं कि इस रोग को मिटाने के लिए मेडिसिन से अधिक आध्यात्म मेडिकल साइंस दवा की जरूर है। यह दवा है मेडिटेशन प्राणायाम और कसरत।
ईश्वर ने आदमी को बहुत ही मजबूत बनाया है कि वह जो चाहे वह कर सकता है। इतना कर सकता है कि एक समय ईश्वर को भी उसके साथ रहकर काम करने की इच्छा हो जाती है। क्योंकि ईश्वर चाहते ही हैं कि वह आगे बढ़े, वह मुझे समझे, कि मैं कौन हूं और वह किसका बच्चा है। क्योंकि ईश्वर को काम करने के लिए किसी पवित्र मनुष्य देहधारी का तन लेना पड़ता है।
जिस दिन वह(मनुष्य) मुझे समझने लग जाएगा उसी दिन में उसकी पहचान दिला सकता हूं कि तू कौन है तू क्यों इस धरती पर आया है और तुझे क्या करना है और क्या करके पुराना घर छोड़कर नए घर वापस जाना है। सृष्टि चक्र के नियम के मुताबिक में ही तुझे धरती पर भेजता हूं और मैं ही तुझे ले जाता हूं। तेरी मृत्यु नहीं होती है क्योंकि तू भी मेरी तरह एक छोटी बिंदु सामान आत्मा है
ईश्वर को जिस दिन आदमी समझने लग जाएगा उस दिन से सभी आसक्तियों से वह मुक्त हो जाएगा। देह में रहते हुए भी देह का अभिमान नहीं रहेगा और देह का सदुपयोग करते-करते वह कई काम जनकल्याण के कर वह चल बसेगा और जन्म मरण से वह न्यारा और प्यार बन जाएगा। फिर वह आदमी इमोशनल का शिकार कभी नहीं बनेगा, दया करुणा प्रेम उसके लिए जलधारा बन जाएगी।
इमोशनल न बनकर ईमानदार, समझदार, अक्कलवान कर्मवीर बन जाएगा।
अगर आप अधिक इमोशनल रहोगे तो लोग आपको लूट लेंगे, आपका उपयोग करेंगे, उपयोग यहां तक करेंगे की आपको मूर्ख समझेंगे और अपने को वह चतुर समझेंगे।
आध्यात्मिकता ज्ञानवर्धक है। जैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा था, मैं जो कहता हूं सच कहता हूं और मैं जो कहता हुं तुम्हें वही करना है, करने मैं कुछ भी पाप नहीं लगेगा, सिर्फ पापियों का वध करना है और उनका उद्धार करना है। फिर वही सच्चाई को जानकर श्री कृष्ण के बताएं पथ पर चल कर आततायीओ का वध अर्जुन ने किया।
तो वैसा ही इस ज्ञान को सोच समझ कर हमें करना है और इमोशनल से दूर रहना है।
अगर आप एक सांसारिक जीवन जी रहे हो तो हर समस्या का समाधान इमोशनल बनकर नहीं, ज्ञान एकाग्रता लीडरशिप और आपका IQ EQ का फुल्ली कॉन्फिडेंस के साथ निर्भय होकर किया जाना चाहिए।
अगर हम आध्यात्मिकता को अपनाते हैं तो आध्यात्मिक एक साइंस है और यह साइंस हमें जीवन जीने की कला सिखाता है और कला ऐसी सीखाता है कि लोग हमें देखकर सुधरते हैं।
यह भी आपको सोच लेना है कि इस पृथ्वी पर हम आए थे अकेले, जाएंगे भी अकेले, श्वास भी अकेले ही ले रहे हो, हर दर्द को भी अकेले ही झेल रहे हो और शरीर को भी छोड़कर अकेले ही जाना है। तो हमें पराई चिंता और इमोशनल से दूर रहना है।
हम खुद ही अपने आप में एक इंस्ट्रूमेंट है। हमें कोई अपना इंस्ट्रूमेंट समझकर उपयोग न करने लग जाए यह हमें सावधानी रखनी होगी….
तो दया खानी है तो खुद पर खाओ, इमोशनल बनना है तो खुद पर बनो तो जीवन जीने का मजा कुछ और होगा। जो कुछ भी हम और आप देख रहे हैं यह सब इस पृथ्वी के रंग मंच पर ड्रामा है। यहां कोई किसी पर दया नहीं खाता है, न करता है। अगर वह कर भी रहा है तो आप उसको कुछ दे रहे हो, उस अपेक्षा में वह आपको दे रहा है। दया नहीं खा रहा है। यही सब खेल परिवार में कुटुंब में दोस्ती में यारी में होती रहती है।
यहां तक की देवता देवी की मूर्तियों के साथ भी ऐसा होता है। इच्छा पूरी हो तो चढ़ावा चढ़े नहीं तो तुम कौन..!? यहां तक की मंदिर की मूर्तियों की पूजा और पूजा में मूर्तियां बदल दी जाती है। आज का आदमी खुद इमोशनल का ड्रामा रचकर भगवान को और लोगों को मूर्ख बनाता है और जो इमोशनल इंसान है उसको बेवकूफ समझकर उससे अपना काम निकलवा लेता है और रास्ता बदल देता है।
इमोशनल न बनकर इंपॉर्टेंट बनो।
इंपॉर्टेंट बनाकर अपने आपको इंप्रूव करो।
यही इंपॉर्टेंट और इंप्रूव आपकी शक्ति बन उभरेंगी और आप इमोशनल और नकारात्मकता से बाहर आकर शक्तिमान बन जाओगे।
पढ़ो पढ़ाओ सुनो सुनावो सफलता को प्राप्त करो।

डॉ कनैयालाल माली ‘उत्सव’
Spiritual writer
मोबाइल नंबर 9913 484546
Email ID utsav.writer@gmail.com

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