विषय:- साहित्य का पथ एक जुनून
साहित्य का पथ एक जुनून…..
एक सागर की तरह अविरत,
हवा के झोंकों की तरह,
अपने आप में गुंजन,
करता रहता हैं,
करता रहता है।
जो कभी खाली नहीं होता है,
इतनी तो गहराई होती हैं उसकी,
अविरत चलता ही रहता है,
अविरत चलता ही रहता है।
जो साहित्य के सागर में,
डुबकी मारना सिख गया,
वो सदा, सदा के लिए,
सदाबहार हो गया,
सदाबहार हो गया।
वो तैरना भी सिख गया,
अपने जीवन के सागर में,
अपनी नैया को चलाने वाला,
…………………वो बन गया,
………………….. वो बन गया।
वो एक माझी बन गया,
अविरत अविरत अविरत…..
………साहित्य सागर का,
अविरत प्रवाह बन गया।
जो कभी खाली नहीं होता,
कभी खली नहीं होता,
चलता ही रहता है,
चलता ही रहता है।
जो साहित्य के सागर में,
डूबकी मारना सिख गया,
वो तैरना भी सिख गया,
जीवन की नैया का माझी बन गया….
अविरत अविरत अवीरत।
राही पथ पर,
चल अकेला,
चल अकेला…
अविरत अविरत अविरत।
गुनगुनाता रहा,
गुनगुनाता रहा,
……..गाता चला,
……..गाता चला,
साहित्य का पथ एक जुनून।
।।अस्तु।।
डॉ. कनैयालाल माली ‘उत्सव’ (उदयपुर)
Spiritual writer
Mo.No. 9913484546
Email ID utsav.writer@gmail.com
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